सिरोही, राजस्थान ।

सिरोही
आधी रात को रोया वाटेरा गांव “कमलेश मेटा हाय-हाय” की गूंज से कांपी धरती
महिलाओं की चीखें, बच्चों की सिसकियां, गांव में मातम जैसा सन्नाटा
प्रस्तावित खनन परियोजना के खिलाफ उबाल- जल, जंगल और जमीन की रक्षा को लेकर गांव में निकली पुतला शवयात्रा
ग्रामीणों ने कहा “धरती हमारी मां है, किसी कीमत पर नहीं देंगे”
सिरोही का वाटेरा बना आंदोलन का प्रतीक आधी रात को दहका विरोध का ज्वालामुखी
पिंडवाड़ा क्षेत्र में चार ग्राम पंचायत के 12 गांवों का एक स्वर खनन परियोजना निरस्त हो
बच्चों की मासूम आवाज “पापा, कमलेश मेटा का क्या हुआ?” सुनकर खामोश हुए पिता
सरकार और नेताओं की चुप्पी पर जनता का दर्द “वोट के वक्त याद आते हैं, अब कहां हैं सब?”
वाटेरा की रात बन गई चेतावनी अगर अब भी नहीं जागी सरकार, फूट पड़ेगा जन ज्वालामुखी
खनन परियोजना के विरोध में ग्रामीणों ने निकाली पुतला शवयात्रा,
महिलाओं ने पीटा सीना, बच्चे सहमे ‘धरती मां को बचाओ’ की पुकार से गूंज उठा गांव

सिरोही।
शुक्रवार की आधी रात जब पूरा देश गहरी नींद में था, तब राजस्थान के सिरोही जिले के पिण्डवाड़ा तहसील के वाटेरा गांव में कोई सो नहीं सका। वजह क्षेत्र में वाटेरा, भीमाना, रोहिड़ा, भारजा ग्राम पंचायत के 800.9935 हेक्टेयर जमीन में मेसर्स कमलेश मेटाकास्ट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी द्वारा प्रस्तावित चूना पत्थर खनन परियोजना के विरोध में ग्रामीण लामबंद हो चुके है। ठंडी हवा में सन्नाटा पसरा था, पर उस सन्नाटे को चीरते हुए एक ही आवाज़ गांव-गांव गूंज रही थी “कमलेश मेटा हाय-हाय… धरती मां की जय!” आधी रात को यह नारा सिर्फ विरोध नहीं था, यह उस दर्द की पुकार थी जो पिछले डेढ़ महीने से इस क्षेत्र की जनता के दिल में उबल रही है।

आधी रात का दृश्य — महिलाओं की चीखें, बच्चों की आंखों में भय
वाटेरा गांव की गलियों में शुक्रवार देर रात एक अनोखा दृश्य देखने को मिला। महिलाएं छाती पीटकर रो रही थीं, बुजुर्गों की आंखों में आंसू थे, और बच्चे सहमे हुए अपनी माताओं के आंचल में छिपे थे।
गांव के बीच चौक में एक पुतला रखा गया था, उस पर लिखा था “मेसर्स कमलेश मेटा कास्ट प्राइवेट लिमिटेड, जयपुर।” ग्रामीणों ने उस पुतले को अर्थी पर रखकर पूरे गांव में शवयात्रा निकाली। “कमलेश मेटा हाय-हाय”, “धरती मां अमर रहे”, “जल-जंगल-जमीन हमारी है” ये नारे गांव की हर दीवार से टकराकर गांव में गूंज रहे थे।
शवयात्रा के बाद उस पुतले का दहन किया गया। दहकती लपटों में गांव की पीड़ा, गुस्सा और बेबसी जल रही थी।

चार ग्राम पंचायतें, बारह गांव — एक ही आक्रोश की लहर
यह आंदोलन सिर्फ वाटेरा का नहीं, बल्कि पिण्डवाड़ा क्षेत्र की चार ग्राम पंचायतों वाटेरा, भीमाना, भारजा और रोहिड़ा के बारह गांवों का सामूहिक आक्रोश है। इन गांवों में पिछले डेढ़ महीने से लगातार प्रदर्शन, धरने और ज्ञापन देने का सिलसिला जारी है। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, सांसद, विधायक, यहां तक कि मुख्यमंत्री कार्यालय तक ज्ञापन भेजे, लेकिन अब तक उनकी सुनवाई नहीं हुई।
एक बुजुर्ग किसान ने आंसू भरी आंखों से कहा
हमने नेताओं से कहा, हमारी जमीन मत छीने… पर किसी ने हमारी आवाज़ नहीं सुनी। अब हम खुद अपनी लड़ाई लड़ेंगे।” ‘हमारी जमीन हमारी मां है’। इस खनन परियोजना में कई ग्रामीणों की खातेदारी जमीनें शामिल हैं। लोगों का कहना है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी धरती को कंपनी के हवाले नहीं करेंगे।
“हम किसान हैं, यह मिट्टी हमारे पुरखों की पहचान है। इसे खोदने नहीं देंगे, चाहे आर-पार की लड़ाई क्यों न लड़नी पड़े,” यह आवाज़ हर गली-मोहल्ले से उठ रही है। गांव के युवाओं ने बताया कि कंपनी के सर्वे के बाद से ही लोगों में भय और असुरक्षा का माहौल है। खेतों में काम करते किसानों के चेहरों से मुस्कान गायब हो चुकी है।
‘दीवाली पर अंधेरा और काली मनाई ’ — उत्सवों पर छाई खामोशी
जहां एक ओर पूरा देश दीवाली की रोशनी में जगमगा रहा था, वहीं वाटेरा सहित आसपास के गांवों में दीये बुझ गए हैं। लोगों ने तय किया है कि जब तक सरकार यह परियोजना निरस्त नहीं करवाती, वे कोई उत्सव नहीं मनाएंगे। एक महिला ने कहा “दीवाली तो तब मनाएंगे जब हमारी जमीन सुरक्षित होगी। जब तक डर है, तब तक खुशियां नहीं।”
बच्चों की मासूम चिंता — ‘पापा, कमलेश मेटा का क्या हुआ?’
अब यह मुद्दा सिर्फ बुजुर्गों या किसानों तक सीमित नहीं।
बच्चे भी इस आंदोलन की हवा में जी रहे हैं। शाम को खेत से लौटते समय जब पिता घर आते हैं, तो बच्चे सबसे पहला सवाल पूछते हैं “पापा, कमलेश मेटाकास्ट का क्या हुआ?” यह मासूम सवाल सुनकर पिता चुप हो जाते हैं, क्योंकि उनके पास कोई जवाब नहीं होता सिवाय चिंता और उम्मीद के।
‘नेताओं ने हमें वोट मशीन समझ लिया’ जनता में गहरा रोष
ग्रामीणों का कहना है कि सत्ता और विपक्ष दोनों की चुप्पी ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया है। वोट के समय नेता गांवों में आते हैं, वादे करते हैं, लेकिन अब जब जनता संकट में है, तो कोई सामने नहीं आ रहा।
एक महिला ने रोते हुए कहा “हमने उन्हें जिताया था, अब वही हमें मरने के लिए छोड़ गए। क्या किसान की जमीन की कोई कीमत नहीं?”
‘जनता अब जाग चुकी है’ जिम्मेदारो को खुली चेतावनी
वाटेरा गांव के युवा और किसान अब एक स्वर में कहते हैं “अब जनता जाग चुकी है। अगर सरकार नहीं जागी, तो यह आंदोलन ज्वालामुखी बन जाएगा।” लोगों ने जिम्मेदारो से साफ कहा है कि अगर उनकी आवाज़ अब भी नहीं सुनी गई, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन जिले से निकलकर पूरे राजस्थान में गूंजेगा।
धरती, जल और जंगल की रक्षा की जंग
ग्रामीणों का यह विरोध सिर्फ जमीन के लिए नहीं, बल्कि पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए है। “अगर जंगल कटे, पानी सूखा और धरती खोदी गई तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी,”
यह कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं, यह मातृभूमि की पुकार है। वाटेरा की रात अब इतिहास में दर्ज हो चुकी है जहां सन्नाटे में लोगों ने आवाज़ उठाई, जहां आंसुओं ने आग बनकर धरती को हिलाया।
और जहां हर ग्रामीण ने ठान लिया “अब हमारी जमीन, हमारी होगी चाहे कुछ भी हो जाए।”
रिपोर्ट @ तुषार पुरोहित
