सिरोही, राजस्थान ।

(रिपोर्ट: सुनील सिंघानिया) ;

आजादी के 77 साल बाद भी गुलामी का सफर, सिरोही के तीन गांवों पर व्यवस्था का ‘अघोषित टैक्स’, हर साल हो रही लाखों की लूट


​ भूतगांव (सिरोही) | जब भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर कदम बढ़ा रहा है, जब देश की धरती से चंद्रयान चांद को चूम रहा है और जब शहरों में 5G की रफ्तार पर इतराया जा रहा है, तब सिरोही जिला मुख्यालय से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर बसे तीन गांव—मनोरा, भूतगांव और जामोतरा—आज भी विकास के एक अदद पहिए के लिए तरस रहे हैं। यह कहानी सिर्फ सड़क या बस की नहीं, बल्कि 77 साल लंबे इंतजार, अनसुनी आवाजों, टूटते सपनों और उस सुनियोजित आर्थिक शोषण की है, जिसने इन गांवों के लोगों की कमर तोड़ दी है। यहां के निवासियों के लिए आजादी का मतलब आज भी निजी वाहनों की दया पर निर्भर रहना है, जहां हर किलोमीटर का सफर उनकी जेब पर डाका और स्वाभिमान पर चोट करता है।
​भाग 1: दैनिक संघर्ष की अंतहीन गाथा
​इन गांवों की सुबह किसी महानगर की तरह गाड़ियों के हॉर्न से नहीं, बल्कि इस चिंता से शुरू होती है कि आज शहर तक कैसे पहुंचा जाएगा। यहां हर वर्ग की अपनी एक कहानी है, जो दर्द, लाचारी और गुस्से से भरी हुई है।
​छात्रों की ‘अग्निपरीक्षा’: शिक्षा या शोषण?
उच्च शिक्षा इन गांवों के युवाओं के लिए एक सपने की तरह है, जिसकी राह कांटों से भरी है। यहां कॉलेज नहीं है, इसलिए युवाओं को सिरोही का रुख करना पड़ता है। भूतगांव के छात्र भंवर प्रजापत का दर्द पूरी युवा पीढ़ी की आवाज है। वह कहते हैं, “गांव में बस नहीं आने से मुझे हमेशा सिरोही कॉलेज जाने के लिए परेशानी होती है। हमारे घर वाले रोजाना जावाल छोड़ने आते हैं। कई बार इस वजह से कॉलेज जाने में देरी हो जाती है।”
​लेकिन यह सिर्फ देरी की बात नहीं है। यह एक आर्थिक ‘अग्निपरीक्षा’ है। एक छात्र को पहले अपने गांव से जावाल तक निजी ऑटो में ₹20 (भूतगांव) या ₹30 (मनोरा) देने पड़ते हैं, और फिर जावाल से सिरोही के लिए अलग किराया। इस तरह एक छात्र का प्रतिदिन का यात्रा खर्च ₹100 से अधिक हो जाता है, जो महीने में ₹2500 से ₹3000 तक पहुंचता है। यह रकम एक किसान परिवार के लिए कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। यह एक तरह का “शिक्षा टैक्स” है जो व्यवस्था की विफलता के कारण छात्रों से वसूला जा रहा है, जो उनकी किताबों, फीस और भविष्य की उम्मीदों पर भारी पड़ रहा है। कई परिवार इसी आर्थिक बोझ के कारण अपने बच्चों, खासकर बेटियों को 12वीं के बाद आगे पढ़ाने से कतराते हैं, और इस तरह कितने ही सपने हर साल इन गांवों की धूल भरी सड़कों पर दम तोड़ देते हैं।
​बुजुर्गों और बीमारों का दर्द: बेमानी सरकारी रियायतें
सरकार कागजों पर वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों को रोडवेज बसों में किराए में रियायत देती है। लेकिन मनोरा की 72 वर्षीय शांति देवी के लिए यह रियायत एक क्रूर मजाक है। उन्हें हर महीने शुगर की जांच के लिए सिरोही जाना पड़ता है। वह कहती हैं, “मेरा सीनियर सिटीजन कार्ड पर्स में रखा रहता है, लेकिन काम नहीं आता। ऑटो वाला तो पूरा किराया लेता है। इस उम्र में धक्के खाते हुए जाना पड़ता है। कई बार हिम्मत नहीं होती तो जांच भी छोड़ देती हूं।” इन गांवों में सैकड़ों बुजुर्ग और बीमार लोग हैं, जिनके लिए अस्पताल पहुंचना किसी जंग जीतने से कम नहीं है। आपात स्थिति में तो हालात और भी भयावह हो जाते हैं, जब समय पर वाहन न मिलने से मरीज की जान पर बन आती है।
​महिलाओं का संघर्ष: सुरक्षा और स्वाभिमान का सवाल
सार्वजनिक परिवहन की कमी का सबसे गहरा असर महिलाओं के जीवन पर पड़ता है। उनकी गतिशीलता और सुरक्षा दोनों ही दांव पर लगी होती है। घर का सामान लाने से लेकर अपने माता-पिता के घर (पीहर) जाने तक, उन्हें परिवार के पुरुष सदस्यों पर निर्भर रहना पड़ता है। अकेले सफर करने की स्थिति में उन्हें ठसाठस भरी निजी जीपों में अजनबियों के साथ असुरक्षित यात्रा करनी पड़ती है। यह स्थिति न केवल उनके आत्मविश्वास को कम करती है, बल्कि उन्हें रोजगार और सामाजिक गतिविधियों से भी दूर कर देती है।
​भाग 2: आर्थिक शोषण का चक्रव्यूह और ‘ऑटो माफिया’ का राज
​बस सुविधा न होने के कारण इन तीनों गांवों में निजी वाहन चालकों का एकछत्र राज है। यह एक असंगठित लेकिन शक्तिशाली ‘ऑटो माफिया’ की तरह काम करता है, जो ग्रामीणों की मजबूरी का फायदा उठाकर दिन-दहाड़े लूट मचा रहा है।
​मनमाना किराया, कोई नियम नहीं:
किराए की दरें तय नहीं हैं। यह ड्राइवर के मूड, दिन के समय और सवारी कीurgence पर निर्भर करती है।
​भूतगांव से जावाल (4.50 किमी): ₹20 प्रति व्यक्ति
​मनोरा से जावाल: ₹30 प्रति व्यक्ति
​जामोतरा से जावाल: ₹10 प्रति व्यक्ति
​यह किराया राजस्थान परिवहन विभाग द्वारा निर्धारित मानकों से कई गुना अधिक है। अगर कोई ग्रामीण इस मनमानी का विरोध करता है, तो उसे वाहन से उतार दिया जाता है। शाम ढलते ही यह किराया और बढ़ जाता है।
​ओवरलोडिंग और सुरक्षा से खिलवाड़:
इन निजी वाहनों में सुरक्षा नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। 8-सीटर जीप में 15-20 सवारियां भरी जाती हैं। लोग दरवाजों पर लटककर और छतों पर बैठकर यात्रा करने को मजबूर हैं। ये वाहन अक्सर खटारा हालत में होते हैं, जिनके ब्रेक और टायर का कोई भरोसा नहीं होता। परिवहन विभाग और पुलिस की नाक के नीचे यह जानलेवा खेल हर रोज खेला जाता है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती।
​गांवों से लाखों की मासिक लूट:
एक अनुमान के अनुसार, इन तीनों गांवों से रोजाना 200-300 लोग काम, पढ़ाई और अन्य जरूरतों के लिए बाहर जाते हैं। यदि एक व्यक्ति का औसत दैनिक खर्च ₹60 भी माना जाए, तो इन गांवों से प्रतिदिन लगभग ₹15,000 से ₹18,000 और महीने में 4 से 5 लाख रुपये सिर्फ इस प्रारंभिक यात्रा पर खर्च हो रहे हैं। यह भारी-भरकम राशि गांव की अर्थव्यवस्था से निकलकर सीधे इन निजी वाहन चालकों की जेब में जा रही है, जिसका कोई हिसाब-किताब नहीं है।
​भाग 3: बहरे कान, अंधी आंखें: प्रशासनिक उदासीनता की कहानी
​यह स्थिति इसलिए नहीं है कि इसका कोई समाधान नहीं है, बल्कि इसलिए है क्योंकि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग आंखें मूंदे हुए हैं। ग्रामीणों ने अपनी आवाज हर उस दरवाजे तक पहुंचाई है, जहां से उन्हें उम्मीद थी।
​ज्ञापन और आश्वासनों का अंतहीन सिलसिला:
ग्रामीणों ने कई बार एकजुट होकर जिला कलेक्टर, सिरोही रोडवेज डिपो के मुख्य प्रबंधक और स्थानीय विधायक को लिखित में ज्ञापन दिए हैं। ग्रामीण अशोक सोनी गुस्से से कहते हैं, “रोडवेज सुविधा नहीं होने से लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ती है। हमने हर चुनाव में नेताओं को अपनी समस्या बताई है। वे वोट मांगने आते हैं तो बस चलवाने का वादा करते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद कोई पलटकर नहीं देखता। हमारे ज्ञापन दफ्तरों में धूल फांक रहे हैं।”
​एक सरल समाधान, जिसे नजरअंदाज किया गया:
ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने एक बेहद सरल और व्यावहारिक समाधान भी रखा है। वर्तमान में सिरोही डिपो से जालोर जाने वाली कई बसें जावाल-बरलूट-वराडा मार्ग से गुजरती हैं। ग्रामीणों का सुझाव है कि इन बसों में से कुछ को जावाल-भूतगांव-मनोरा-वराडा के रास्ते से चलाया जाए। इस मार्ग परिवर्तन से यात्रा के समय में मुश्किल से 10-15 मिनट का फर्क आएगा, लेकिन इससे तीन गांवों की हजारों की आबादी सीधे तौर पर जिला मुख्यालय और मुख्य सड़क मार्ग से जुड़ जाएगी। यह रोडवेज के लिए भी एक लाभकारी कदम होगा, क्योंकि इससे उसे एक नए रूट पर निश्चित यात्री मिलेंगे और उसकी आय में वृद्धि होगी। लेकिन इस ‘विन-विन’ प्रस्ताव पर अमल करने की इच्छाशक्ति किसी में नहीं दिख रही।
​निष्कर्ष: आखिर कब टूटेगा यह 77 साल का इंतजार?
​मनोरा, भूतगांव और जामोतरा की यह कहानी सिर्फ परिवहन की कमी की नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत में नागरिक अधिकारों के हनन और विकास के असमान वितरण की कहानी है। यह कहानी व्यवस्था से सीधे सवाल पूछती है:
​क्या इन गांवों के लोगों का नागरिक होना सिर्फ वोट देने तक सीमित है?
​छात्रों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक और मानसिक शोषण सहने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है?
​एक सरल प्रशासनिक निर्णय, जो हजारों लोगों के जीवन को बदल सकता है, उसे लेने से अधिकारी क्यों कतरा रहे हैं?
​अब इन गांवों के लोगों का धैर्य जवाब दे रहा है। वे अब और खोखले वादे सुनने को तैयार नहीं हैं। वे अपने बच्चों के भविष्य, अपने बुजुर्गों के स्वास्थ्य और अपने स्वाभिमान के लिए एक अदद रोडवेज बस की मांग कर रहे हैं। अगर प्रशासन जल्द ही इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाता, तो यह 77 साल का मौन इंतजार एक बड़े आंदोलन में बदल सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी उस व्यवस्था की होगी जो अपने ही नागरिकों को उनका बुनियादी हक देने में विफल रही है।

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