समलैंगिक विवाह को विधि मान्यता न देने को धर्मगुरुओ द्वारा राष्ट्रपति के नाम जिला कलेक्टर को दिया ज्ञापन,
सिरोही(हरीश दवे),
समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई याचिका को निपटाने के लिए जिस प्रकार की जल्दबाजी सुप्रीम कोर्ट के द्वारा की जा रही है वह कदापि उचित नही है । यह नए विवादों के जन्म तो देगी हो साथ ही भारतीय संस्कृति के लिए अत्यंत घातक भी सिद्ध होगी । एक और तो समलैंगिक संबंधों को प्रकट करने के लिए मना किया गया , वही दूसरी ओर उनके विवाह की अनुमति पर विचार किया जा रहा है । क्या इससे निजर्क के अधिकार का उल्लंघन नहीं होगा ? विवाह का विषय विभिन्न आचार संहिताओ दवारा संचालित होता है I भारत में प्रचलित कोई भी आचार संहिता इसकी अनुमति नहीं देती I क्या सर्वोच्च न्यायलय एन सब में परिवर्तन करना चाहेगा ? तिर्थगीरी जी महाराज ने कहा समाज “विवाह” को परिभाषित करता है और कानून उसे केवल मान्यता देता है। विवाह कानून द्वारा रचित एक सामाजिक संस्थान नहीं है बल्कि यह एक सदियों पुरानी संस्था है जिसे समाज ने समय के साथ परिभाषित और विकसित किया है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव के द्वारा चुनी गई सरकार लोगों की इच्छाओं को व्यक्त करती है ।

विधानमंडल के माध्यम से व्यक्त की गई जन अभिव्यक्ति से विवाह जैसी संस्था में कोई भी संशोधन प्रभावी होना चाहिए । हालांकि हमारा संविधान कानूनो की न्यायिक समीक्षा का अधिकार माननीय उच्चतम न्यायालय को देता है, लेकिन ऐसी समीक्षा शक्ति का प्रयोग विधाई शक्ति के अतिक्रमण के रूप में नहीं होना चाहिए। यह बात पर्सनल विधियों या विवाह जैसी संस्थानों के विषय में अधिक प्रासंगिक है , क्योंकि इसके द्वारा समाज, परिवार और राष्ट्र का निर्माण होता है। पांच न्यायाधीशों द्वारा राष्ट्र की इस मूल व्यवस्था में किसी भी प्रकार का एकतरफा परिवर्तन ना केवल लोकतांत्रिक मूल्यों बल्कि “ संवैधानिक शक्तियों के पृथक्करण” की मूल भावना के सिद्धांत के भी विपरीत है। मोहम्मद रफ़ी ( जामा मज्जिद काजी ) ने कहा की विवाह मूल रूप से दो लोगों के बीच कानून द्वारा मान्यता प्राप्त संबंध है जो या तो असंहिता के रूप में या तथागत कानून द्वारा नियंत्रित होता है । कोई भी असंहिता बंध व्यक्तिगत कानून या कोई संहिता बंध वैधानिक कानून एक ही लिंग के दो लोगों के बीच विवाह की संस्था को ना तो मान्यता देता है और ना ही स्वीकार करता है। यह याद रखना चाहिए की स्वीकृति प्रदान करना और अधिकारों, विशेषअधिकारों और मानवीय संबंधों को मान्यता प्रदान करना, जिसके कानूनी परिणाम होते हैं अनिवार्य रूप से समाज और विधायिका का कार्य है। यह कभी भी न्यायिक निर्णय का विषय नहीं हो सकता है। संत श्री पागल बाबा जी (वेदनाथ महादेव सिरोही ) ने कहा की समलैंगिक संबंधों को गैर-अपराधीकरण के बाद समान लिंग वाले जोड़ों को विवाह का अधिकार प्रदान करना न्यायालय की अति सक्रियता का प्रतीक है। समान लिंग के वयस्कों के बीच योन कृतियों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का मुख्य आधार “निजता के अधिकार” का उल्लंघन था। समान लिंग वाले जोड़ों को शादी करने का मौलिक अधिकार देना, विवाह के मूल स्वभाव से और ‘ निजता के अधिकार’ द्वारा प्रदत्त सुरक्षा के आयामों से पूर्णता अलग तथा आवश्यक रूप से गैर-अनिवार्य है।
ज्ञापन कार्यक्रम में फिरोज अहमद , दिनेश महाराज , संत श्री तीर्थगिरी महाराज (मंडवारिया मठ) मोहम्मद रफी जामा मस्जिद सिरोही फिरोज अहमद दिनेश महाराज संत श्री पागल महाराज ( वेदनाथ महादेव मंदिर सिरोही संत शिवानंद जी सरस्वती संत श्री शंकरानंदगिरी जी महाराज संत लक्ष्मणदास जी उदासीन निर्माजन समेत संत समाज उपस्थित रहे I
