यहां विशेष ध्वनि की ‘थाप और डंडे के स्पर्श पर सुख समृद्धि और शांति की होली का बजता है, ‘ढोल,!

आबूरोड,( सिरोही),

देश में भिन्न भिन्न रूप से मनाए जाने वाला होलिकोत्सव पर्व कहीं लट्ठमार होली के नाम से, कहीं कहीं बारूद के खेल से, कहीं फूलों से तो कहीं पशुधन दौड़ से अधिकांश रंगों से, कहीं चंग की थाप,। यहां एक इलाके में होली का शुभारंभ गांव के पटेल मुखिया द्वारा ढोल की थाप के शुभारंभ से होली का श्री गणेश होता है, जो शीतला सप्तमी तक चलता है शुभारंभ के बाद घर घर में और होलिका दहन स्थानों पर ढोल वादन के साथ ज्वारा नृत्य, रायण नृत्य, और बाबा नृत्यों का धम चक रहता है!

– ढोल वादन की आवाज परिवर्तन के साथ बदल जाता है नृत्य का रूप रंग भी:- ढोल वादन की शैली और आवाज अलग-अलग ढंग से बजाई जाती है, दुर्घटना या आपदा के समय ढोल वादन की शैली अलग, एकता के बिगुल के समय की शैली अलग, विवाह संस्कार के समय अलग, रातीजगा के समय अलग, और राईण नृत्य, बाबा नृत्य, गैर नृत्य, तथा होलीकोत्सव आदि अलग शैली की बोली में बजाया जाता है, और फिर उसी अनुरूप बाबा नृत्य, नृत्य ज्वारा नृत्य, एवं अन्य प्रकार के नृत्य अनुरूप स्वत: लय ताल में प्रदर्शन कर देते हैं।

– होलिका दहन, स्वांग बाबा नृत्य, एवं रायण नृत्य की विशेष ध्वनि का इस समय घर-घर में डंका:-

इस समय होलिकोत्सव का पर्व है यहां की स्थानीय परंपरा अनुसार होलिका दहन स्थल पर स्वांग रचक आ जाने पर बाबा नृत्य का ढोल, होलिका दहन होते समय होली के चारों ढोल वादको द्वारा गोल घेरे में बजाए जाने वाले ढोल वादन की अलग ध्वनि, व्रत धारी उपासकों द्वारा अंगारों पर निकलते समय की अलग ध्वनि ओर तलवार के साथ किए जाने वाले रायण नृत्य के दौरान बजाई जाने वाली ध्वनि भिन्न – भिन्न डंके और थाप की होती है।

फोटो:– गुजरात सीमा की सरहद के राजस्थान के गांव रणोरा में होली कोउत्सव की विशेष ध्वनी के रूप में ढोल बजाता वरदहस्त ढोलवादक।

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